वैश्वीकरण

वैश्वीकरण

वैश्वीकरण इंग्लिश के शब्द ग्लोबलाइजेशन का हिंदी रूपांतरण है।  इसका शाधिक अर्थ है िस्थानिया या क्षेत्रीय वस्तुऐं या घटनाओं के विश्वस्तर पर रूपांतरण की प्रकिया है।  इसे एक ऐसी प्रकिया का भी वर्णन करने के लिए किया जा सकता है जिसके द्वारा पूरे विश्व के लोग मिलकर एक समाज का निर्माण करते हैं तथा एक साथ कार्य करते हैं।  यह प्रकिया आर्थिक सामाजिक तकनीकि और राजनेतिक ताकतों का एक संयोजन है। वैश्वीकरण का उपयोग अक्सर आर्थिक वैश्वीकरण के सन्दर्भ में किया जाता है, अर्थात व्यापार विदेशी प्रत्शक़ निवेश पूंजी प्रवाह प्रवास और प्रोद्योकिकी के माध्यम से राष्ट्रीयह अर्थव्य्वस्थाओं का अंतर्राष्ट्रीयह व्यवस्था में एकीकरण को वैश्वीकरण की संगाया दी जाती है। 

वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग 1980 से अर्थशास्त्रियों से किया जा रहा है। 

“थिओडोर लेविट” हार्वर्ड के प्रूव प्रोफेसर को इस शब्द को गढ़ने का श्रेह दिया जाता है। 

वैश्वीकरण

वैश्वीकरण का अर्थ

वैश्वीकरण का अर्थ है अंतर्राष्ट्रीयह एकीकरण, विश्व व्यापार का खुलना, उन्नत संचार साधनो का मिलना, बाज़ारों को अंतर्राष्ट्रीयह बहुर्राष्ट्रीयह कंपनी का महत्त्व बढ़ाना, देश के लोगो का अन्यं देशों में जाना, पूँजी आंकड़े व विचारों को गतिशीलता देना। 

यह एक ऐसे प्रकिया है जिसने विविधता से पूर्ण दुनिया को एकल समाज में स्वीकृत किया है।  वैश्वीकरण एक बहुचरतित व  विवादित विचारधारा है परन्तु इस बात पर आम सहमति है की वैश्वीकरण के दौर में लोगो के पूँजी भाव व विचारो के अंतर्राष्ट्रीयह प्रवाह में अबोहतपूर्व वृद्धि हुई है। 

वैश्वीकरण की विशेषताएं

वैश्वीकरण की प्रकिया अपने अंदर कुछ विशेषताओं को संलिप्त किये हुए हैं जिससे हमारा समाज एक नई प्रकार की सामजिक, राजनितिक तथा आर्थिक इस्तिती को सन्यापित करने की ओर प्रयत्न हो रहा है।  इस अनुसार वैश्वीकरण की निन्म विशेषताएं हैं :-

भौगोलिक दूरियों का सिमटना –
वैश्वीकरण प्रकिया में यातायात एवम संचार के साधनों में क्रांतिकारी विकास के फल स्वरुप भौगोलिक दूरियाँ सिमट गयी हैं।  फ़ोन, फैक्स,  कंप्यूटर, इंटरनेट के माध्यम से समूचे विश्व को हम अपने अध्यन कक्ष से ही संपर्क स्थापित कर सकते है। 
प्राचीन काल में लोग यात्रा या दूरी को बड़ी कठिनता या समय को वयवस्तीत करना होता था, लेकिन आज वायुयान जैसे यातायात के साधनाओं से दूरियों को सम्पात कर बहुत छोटा बना दिया है। 
एक नयी संस्कृति का विकास या उभार –
वैश्वीकरण की प्रकिया में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की दूर दराज़ की पहुंच ने एक नई विश्व संस्कृति को उभरा है। जीन्स, टी शर्ट, फ़ास्ट फ़ूड, पॉप संगीत, नेट पर चैटिंग आदि तत्वों को  समेटकर एक नई संस्कृति सुजीत हुई है, जिससे सभी देशों के सभी युवा प्रभावित हुए हैं। 
श्रम बाजार का विश्वव्यापीकरन –
वैश्वीकरण के कारण ही आज लोग अलग अलग देशों में भी जाकर वयवसाय या श्रम करके विदेशी मुद्रा कमाते हैं एवम अपने मूल देश की उपस्थिति को उस देश के विकास में अपना योगदान दर्ज करते हैं। सन १९६५ में ७.५ एवम सन १९९९ में १२ करोड़ लोग अन्य देशों में श्रम के लिए प्रवासित हुए, जो की आज के दौर में यह आंकड़ा और बढ़ गया है। प्रवासी श्रमिको की सुविधा व अन्य जानकारी को “प्रवासी श्रमिक एवम रोजगार सेतु पोर्टल” पर अंकित किया जाता है।  इससे भारत सरकार द्वारा “डिजिटल इंडिया अवार्ड २०२०” भी दिया गया है।
बिचौलियों को बढ़ावा –
वैश्वीकरण की प्रकिया के तहत लोगो को अन्य देशों में काम दिलवाने(वैद्य एवम अवैद्य) तरीके से एजेंट शामिल होते हैं, जिससे कभी कभी लोगो को गलत जानकारी देकर भेजा जाता है। जिस काम की उनको जानकारी नहीं होती है, ऐसे कार्यों को करना पड़ता है जिससे नियोजक उनके साथ गलत व्यहार करते है। इसके बदले बिचौलियों को उनकी जेब भरने में आसानी होती है। अतः सरकारों के द्वारा इस पर नियंत्रण व्यापक रूप से स्थापित करने की आवश्कयता है।
अंतरराष्ट्रीय आवागमन में लचीलापन –
वैश्वीकरण की प्रकिया के फल स्वरुप आज विभन देशों के डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, प्रभन्ध  बैंकर, कंप्यूटर इंजीनियर आदि का आवागमन पूँजी प्रवाह की तरह सरल व लचीला हो गया है। 
बहुराष्ट्रीय कंपनी की सहकर्ता –
वैश्वीकरण की इस प्रकिया में बहुराष्ट्रीय कंपनी की सहकर्ता बढ़ गयी है।  पहले के समय में कंपनी उत्पादित वस्तु या सेवा को स्थानांतरित करती थी, किन्तु आज के समय में कंपनी अपनी शाखा उस देश में स्थापित करती है।  खुद सेवा का उद्पादन व बिक्री दोनों उसी देश में रह कर संचालित करती है।  कभी कभी राष्ट्र भी इन्हे अनुदान प्रदान करते हैं अपने अपने हितो के अनुसार। 

वैश्वीकरण के गुण

वैश्वीकरण एक विश्वव्यापी धारणा है जिससे न सिर्फ भारत देश अपितु सम्पूर्ण राष्ट्र लाभान्वित हो रहे है। इनके कुछ गुणो को इस तरह से समझा जा सकता है –

नवीन तकनीकों का आगमन –
वैश्वीकरण के द्वारा विशेष रूप से विदेशी पूँजी के निवेश में वृद्धि होती है एवम नवीन तकनीकों  का आगमन व लेनदेन होता है जिससे उत्पादक व उत्पाद की किस्मो में सुधार होता है व मुद्रा का विनिमय व स्थान्तरण होता है।
जीवन स्तर में वृद्धि –
वैश्वीकरण से जीवन में  वृद्धि होती है क्यूंकि उपभोगता को उन्नत व पर्याप्त मात्रा में वस्तुएँ न्यूतम मूल्य पर मिल जाती हैं।  यही कारण है की चीन की सेमिकंडक्टर चिप का निर्माण व निर्यात रोकने पर सम्पूर्ण विश्व में गाड़ी व मोबाइल की प्रतीक्षासूची व मूल्य अवरोधन जैसे समस्या देखने को मिल रही है। 
विदेशों में रोजगार के अवसर –

वैश्वीकरण ही वो कुंजी है जो एक दुसरे देश का व्यक्ति भी कहीं और जाकर व्यापार करने के ताले खोल सकता है। 

विदेशी व्यापार में वृद्धि –
आयत निर्यात में लगे अनावशयक प्रतिबन्ध समाप्त हो जाने के कारण विदेशी व्यापार में वृद्धि हुई है।
तीव्र आर्थिक विकास –
वैश्वीकरण के कारण प्रत्येक देश को अन्य राष्ट्रों के साथ मिल कर तकनिकी ज्ञान के आदान प्रदान का अवसर मिलता है तथा विदेशी पूँजी का आवागमन होता है जिससे अर्थवयवस्था में तेज़ी आती है और विकास भी बहुत तेज़ी से होता है। 
विदेशी मुद्राकोष में वृद्धि –
जिस राष्ट्र का उत्पादन श्रेत्र किस्म का और पर्यात मात्रा में होता है उनका निर्यात व्यापार में तेज़ी आती है।  इसका फलस्वरूप होता है की विदेशी मुद्राकोष में वृद्धि होती है तथा भुगतान संतुलन की समस्या का निदान होता है। वर्त्तमान में इस तरह की समस्या से कई देश पूर्ण तरीके से ग्रसित हैं, यहाँ तक की उन्होंने यह घोषणा भी की है की जो भी ने व्यक्ति ने डॉलर रखे हैं, वह बैंक में जाकर उनका विनिमय करवाए जिससे उस देश को भुगतान करने क लिए डॉलर की मात्रा का विकास हो सके। 
उत्पादकता में वृद्धि –
अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता के कारण देश में अपनी वस्तुओं की मांग एवम निर्यात में सक्षम बनने के लिए देशी उद्योग अपनी उत्पादकता एवम गुणवक्ता के सुधार में लग रही हैं और इसके फलस्वरूप बहेतर प्रकार के सामान लेकर जनता के सामने आ रही हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक, कार उद्योग, टेक्सटाइल उद्योग ने दिशा में सुधार किये हैं। 

वैश्वीकरण के दोष, हानियाँ एवम दुष्परिणाम

वर्त्तमान समय में प्रत्येक राष्ट्र वैश्वीकरण को अपना रहा है एवम राष्ट्र इसका गुणगान कर रहें हैं, लेकिन इसके कुछ दोष भी हैं यद्यपि लाभ-हानि एक दुसरे के पूरक होते हैं। 

आर्थिक असंतुलन –
वैश्वीकरण के कारण विश्व में आर्थिक असंतुलन पैदा हो रहा है। गरीब राष्ट्र अत्याधिक गरीब हो रहा है और अमीर राष्ट्र अत्याधिक अमीर हो रहा है। अतः यह गरीबी और अमीरी के बीच अस्मयता बढ़ती जा रहें है। 
देशी उद्योगों का पतन –
वैश्वीकरण के कारण इस्थानियाँ उद्योगों का पतन होता जा रहा है, विदेशी सामान के आगे देसी सामान नहीं टिक पाते हैं, उनका सामान बिक नहीं पता हैं या उन्हें घाटे में बेचना पड़ता है।  यही कारण है की कई धंधे बंद हो गए हैं या फिर बंद होने की कगार पे हैं।
बेरोजगारी में वृद्धि
वैश्वीकरण के कारण विदेशी माल मुक्त रूप से भारतीय बाजार में अपना प्रबुध्त्व इस्थापित कर रहे हैं, अन्तः भारतीय बाज़ारों में लगे कारीगर का धंधा बंद होने के कारण बेरोज़गारी में वृद्धि होती जा रही है। अथवा उद्योगों में लगे श्रमिको की संख्या घट रही है। 
राष्ट्र प्रेम की भावना को नुक्सान
वैश्वीकरण राष्ट्र प्रेम व स्वदेश की भावना को ठेस अथवा हानि पहुंचा रहा है। लोग विदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना अपनी शान समझते है। देसी वस्तुयों को अच्छी नज़र से नहीं देखते। 
अन्तर्राष्ट्रीयह संस्थाओं का दबाव
देश अन्तर्राष्ट्रीयह मुद्रा कोष विश्व गेट आदि अन्तर्राष्ट्रीयह संस्थाओं के दवाब में काम करती है। हितों की उपहेलना करके सरकार को इनकी शर्तें माननी पड़ती हैं। यही कारण है कि भारत सरकार को कुछ नीतियां व सुधार अन्तर्राष्ट्रीयह सिद्धांतो के अनुसार करनी पड़ती हैं।
विलासिता के उपयोग में वृद्धि
वैश्वीकरण के कारण पच्शिमि देशों में प्रचलित विलासिता के साधन, वस्तुऐं तथा अश्लील साहित्य का भारतीय बाज़ारों में प्रवेश हो गया है। इससे सांस्कृतिक पतन का खतरा बढ़ गया है एवम अकर्मण्यता बढ़ी है।

इस प्रकार येह कहा जा सकता है कि वैश्वीकरण एक मीठा ज़हर है जो अर्थव्य्वस्थाय को धीरे धीरे गाला रहा है और हमे आर्थिक गुलामी कि ओर बढ़ा रहा है। इस सृंखला में चीन का पाकिस्तान पर प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। 

निष्कर्ष

संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि वैश्विकारण के द्रारा हम एक दुसरे से नज़दीक आ रहे हैं, सुविधाओं का आदान प्रदान करते हैं, मुद्राओं का आदान प्रदान करते हैं। भौगोलिक दूरियां लगभग शून्य हो गयी हैं, कहीं पर सुविधाएँ एक दुसरे से विनमिलित हो रही हैं, तो कहीं गरीबी अमीरों की खाड़ी बढ़ती जा रही हैं। संस्कृतयाँ भी विनमिलित होती जा रही हैं। हम एक दुसरे की रर्ति रिवाज़ों को भी अपनाते जा रहे है। कहीं हम इस गतिविधि के द्वारा दूसरों के संस्कृतियों को आत्मसाद करते हैं। यह ठीक है, किन्तु हम अपनी संस्कृति को भूल रहे है। यह वैश्विकारण की सकारात्मक दृष्टि के रूप में नहीं देखा जा सकता है।

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